उत्तराखंडताजा खबरें

बर्मिंघम में गूंजे प्रीतम भरतवाण के जागर और लोकगीत, झूम उठे प्रवासी उत्तराखंडी

  • ढोल-दमाऊ की थाप पर सजी लोकसंगीत की महफिल, अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहने का दिया संदेश

बर्मिंघम (यूनाइटेड किंगडम): पद्मश्री जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण की शानदार लोकसंगीत प्रस्तुति ने ब्रिटेन के बर्मिंघम में प्रवासी उत्तराखंडियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उत्तराखंड वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन और शिल्पा प्रोडक्शन के तत्वावधान में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में इंग्लैंड के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में उत्तराखंडी शामिल हुए। पारंपरिक जागरों, लोकगीतों और पंवाड़ों की गूंज के बीच पूरा सभागार उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के रंग में रंग गया।

प्रीतम भरतवाण ने अपने लोकप्रिय लोकगीतों और पारंपरिक जागरों की प्रस्तुति से दर्शकों का दिल जीत लिया। पहाड़ की मिट्टी से जुड़ी लोकधुनों ने प्रवासी उत्तराखंडियों को अपनी जन्मभूमि, गांवों और सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाई। हर प्रस्तुति पर सभागार तालियों से गूंजता रहा और दर्शक उत्साह से झूमते नजर आए।

ढोल-दमाऊ की थाप पर झूमे दर्शक

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण उस समय देखने को मिला, जब प्रीतम भरतवाण और उनके भाई सुरतम भरतवाण ने पारंपरिक वाद्ययंत्र ढोल-दमाऊ हाथों में लेकर गायन और वादन किया। पारंपरिक जागर की लय और ढोल-दमाऊ की गूंज ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया। दर्शक अपनी जगह से खड़े होकर तालियां बजाने लगे और लोकधुनों के साथ झूम उठे।

इस अवसर पर अंजलि खरे, सुरतम भरतवाण और विवेक नौटियाल सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। आयोजकों ने प्रीतम भरतवाण और उनकी टीम का स्वागत एवं अभिनंदन किया। कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ और दर्शकों के उत्साह से आयोजक भी उत्साहित नजर आए।

नई पीढ़ी तक पहुंचाएं लोकभाषा और संस्कृति

अपने संबोधन में प्रीतम भरतवाण ने प्रवासी उत्तराखंडियों से अपनी मातृभाषा, बोली, लोकसंगीत और सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित रखने तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहना हमारी पहचान और अपनी जड़ों के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

कार्यक्रम की सफलता पर प्रीतम भरतवाण ने उत्तराखंड वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन, शिल्पा प्रोडक्शन, आयोजकों, सहयोगियों और उपस्थित श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।

बर्मिंघम में आयोजित यह सांस्कृतिक संध्या इस बात का प्रतीक बनी कि उत्तराखंड का लोकसंगीत सात समंदर पार भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने की क्षमता रखता है।

Related Articles

Back to top button